यह विभाजन भारतीय परंपरा में कभी था ही नहीं। अंग्रेज़ों के आने के पूर्व कहीं कोई उल्लेख नहीं है। यह पूरी की पूरी एक कपोल कल्पना है! हम वैज्ञानिक, धार्मिक, सामाजिक रूप से इस गप्प को देखते हैं।
भारत के किसी भी प्राचीन ग्रंथ वेद (वेदों के शीर्ष भाग उपनिषद), किसी भी भाषा की रामायण, महाभारत,किसी भी पुराण अथवा तामिल संगम साहित्य में भी, कहीं भी “आर्य नस्ल बनाम द्रविड़ नस्ल” जैसा विचार विद्यमान ही नहीं है।
सदैव से संपूर्ण भारतीय परंपरा में ‘आर्य’ का अर्थ: श्रेष्ठ आचरण वाला, सज्जन, उदार, शीलवान और “अनार्य” का अर्थ दुष्ट आचरण वाला ही माना गया है! अर्थात् आर्य एक नैतिक शब्द था, नस्ली नहीं।
दूसरी ओर ‘द्रविड़’ शब्द संस्कृत के द्रविड़ /द्रमिल /तमिल से आया है । पुनः पढ़ें ( मेरे बड़े पिताजी स्वतंत्र भारत के सबसे पहले भाषा वैज्ञानिकों में से थे! द्रविड़ शब्द भी संस्कृत का है) यह भारत के दक्षिणी भाग भू-प्रदेश और भाषा-समूह का नाम है। यह किसी नस्ल का नहीं है जो मैकाले एंड कंपनी द्वारा गढ़ा गया। नेहरू रोमिला थापर द्वारा पोषित किया गया। भारत में यह विभाजन सांस्कृतिक या भाषाई विविधता था, न कि अलग ‘जातियाँ’ या ‘नस्लें’।
नस्लवाद और औपनिवेशिक मानसिकता का आधार कैसे बना इसे ध्यान से समझा जाये?
19वीं सदी का यूरोप नस्लवाद से भरा था। बहुत कुछ आज भी है। उस समय यूरोपीय तथाकथित विद्वान मानवता को 3–4 नस्लों में बाँटते थे:
- Caucasian (सफेद)
- Mongoloid (पूर्वीय)
- Negroid (अफ्रीकी)
भारत जैसी जटिल सभ्यता में उनका यह मॉडल फिट नहीं होता था, तो उन्होंने भारत को अपनी नस्ल-थ्योरी के अनुसार तोड़ना शुरू किया।
इसी से जन्म हुआ-
- “आर्य= गोरे हमलावर” (जो कि जेनेटिक थ्योरी से ग़लत सिद्ध हो चुका है।)
- “द्रविड़ = काले मूल निवासी (दक्षिणी और उत्तरी भारत की जेनेटिक समानता, वैज्ञानिक आधार पर इस असत्य सिद्ध कर रही हैं।)
तो! यह विभाजन भारतीय वास्तविकता पर नहीं, यह यूरोपीय नस्लवादी कपोल कल्पना पर आधारित था।
मैक्स मूलर और भाषाविज्ञान से कैसे शुरू हुआ यह भ्रम ?
मैक्स मूलर ने इंडो-यूरोपियन भाषाओं का अध्ययन किया। उन्होंने इंडो-आर्यन भाषा-समूह कहा जो एक भाषाई वर्गीकरण था। लेकिन यूरोपीय विद्वानों ने इसे बना क्या दिया ?
भाषा→ नस्ल→ आक्रमण
जबकि भाषा का फैलाव कई तरह होता है। जैसे व्यापार, संस्कृति, प्रव्रजन, शिक्षा, विवाह अर्थात हर जगह आक्रमण नहीं होता। लेकिन युरोपियन को लड़ाई के अतिरिक्त न तब दिखता था न आज कुछ दिख रहा है।
अर्थात् भाषा=नस्ल=आक्रमण! यह एक कुटिल औपनिवेशिक तर्क था, वैज्ञानिक नहीं। पुनः पढ़ें यह एक औपनिवेशिक सोच थी, जिसका आज का विज्ञान खण्डन कर रहा है ।
पुनः कह रहा हूँ कि पुनः पढ़ें विज्ञान की हर धारा औपनिवेशिक तर्कों का खण्डन कर रही है।
ब्रिटिश शासन ने “Divide and Rule” के लिए ही इसे प्रचारित किया और काले अंग्रेज़ों ने 1947 के बाद पोषित किया।
क्योंकि ब्रिटिश नीति स्पष्ट थी कि भारत को बाँटो, जिससे कि वह दुर्बल हो जाए और इसलिए उन्होंने नकली मनगढ़ंत विभाजन बनाए:
- आर्य बनाम द्रविड़
- उत्तर बनाम दक्षिण (जबकि हमारे लिये वह दिशा का सूचक है)
- आर्य भाषा बनाम द्रविड़ भाषा
- सभ्य आर्य बनाम असभ्य द्रविड़
- ब्राह्मण बनाम शूद्र
ब्रिटिश प्रशासक रॉबर्ट काल्डवेल ने 1856 में पहली बार “द्रविड़” को एक अलग नस्ल बताया, जो शोध से नहीं, राजनीतिक उद्देश्य से प्रेरित था।
और फूले पचके इत्यादि लोगो को निर्मित किये गये। स्कूल-कॉलेजों में यही सिद्धांत पढ़ाया गया ताकि भारतीय आपस में लड़ें।
AIT (आर्यन इनवेज़न थ्योरी) और Dravidian-Race Theory दोनों को शिक्षा प्रणाली में शामिल किया गया। नेहरू, रोमिला, गुहा ने मनगढ़ंत इतिहास लिखे।
परंतु: आज न पुरातत्व इसका समर्थन करता है, न DNA इसका समर्थन करता है, न प्राचीन साहित्य और न सांस्कृतिक निरंतरता के तथ्य। यह पूरी तरह यूरोप की काल्पनिक नस्ल-थ्योरी थी। मनगढ़ंत और विकृत भ्रम फैलाया गया।
आधुनिक विज्ञान ने इन सिद्धांतों को गलत सिद्ध किया
आनुवंशिकी विज्ञान ( DNA) क्या कहती है? ◆ उत्तर और दक्षिण भारतीयों का DNA अधिकतर समान,
- कोई “अलग नस्ल” नहीं,
- कोई “बाहरी आर्य” नहीं,
- कोई अचानक आनुवंशिक बदलाव नहीं,
- सब भारतीय एक ही प्राचीन मूल जनसंख्या के अंग
पुरातत्व विज्ञान क्या कहती है ?
- सिंधु , वैदिक संस्कृति में निरंतरता किसी भी बाहरी आक्रमण का प्रमाण नहीं (आक्रमण सातवीं सदी के बाद अरब से हुआ )
- कोई जनसंख्या replacement नहीं
भाषाविज्ञान क्या कहता है ?
भाषाएँ अलग हो सकती हैं, पर भाषाओं से नस्ल नहीं बनती। लगभग सभी भारतीय भाषाओं में अद्भुत समानताएं भी हैं ।
आज इतिहासकार क्या मानते हैं? (वे इतिहासकार जिनमें थोड़ा बहुत सत्य कहने का साहस है)
- आर्य एक सांस्कृतिक शब्द है।
- द्रविड़= भाषाई/भौगोलिक शब्द है।
- नस्ल-आधारित विभाजन= औपनिवेशिक निर्माण
- भारत की सभ्यता= सतत, मिश्रित, साझा, प्राचीन विकास
अब इसे कहा जाता है कि शेयर की हुई सभ्यता—Shared Civilizational Heritage”। किसी एक समूह की देन नहीं। संतों के आधार पर देखा जाये!
- आदि शंकराचार्य (केरल) दक्षिण भारत के विद्वान, संपूर्ण भारत में मठ स्थापित किए, श्रृंगेरी, बदरीनाथ, द्वारका और पुरी। भगवद्पाद के दर्शन “अद्वैत वेदांत” को भारत के उत्तरी भाग, दक्षिणी भाग, पूर्वी भाग और पश्चिमी भाग में समान रूप से अपनाया। उनके शिष्य पूरे भारत में फैले। यदि उत्तर–दक्षिण विभाजन होता तो यह संभव ही नहीं था।
- रामानुजाचार्य (तमिलनाडु), भगवान रामानुज, श्रीवैष्णव दर्शन के प्रवर्तक उनके अनुयायी पूरे भारत में फैले।
- वेद, उपनिषद, भगवद्गीता, सभी को दक्षिणी भारत से समझाया और प्रतिष्ठित किया, 12 आलवारों की भक्ति को वैदिक दर्शन से जोड़ा। उनकी परंपरा दिखाती है कि पूरे भारत की आस्थाएँ एक-दूसरे की निरंतरता हैं, विरोध नहीं।
- मध्वाचार्य (कर्नाटक) भगवान मध्व- द्वैत दर्शन के प्रवर्तक, वेदांत परंपरा को दक्षिणी भाग से उत्तरी भारत तक जोड़ने वाले आचार्य , बदरीनाथ तक यात्रा कर वेद-व्यास से दीक्षा लेने का वर्णन।
- नयनमार–आलवार संत (तमिल भक्ति आंदोलन)- शिव और विष्णु की आराधना को वेदों और आगमों से जोड़ा, भक्ति-युग में उत्तर भारतीय आराध्यदेव, राम, कृष्ण, दक्षिणी भारत में उतनी ही श्रद्धा से प्रतिष्ठित हुए। इससे स्पष्ट है कि सांस्कृतिक एकता गहरी थी, नस्लीय विभाजन नहीं।
- तिरुवल्लुवर (तिरुक्कुरल)- उनका ग्रंथ नैतिकता, धर्म, न्याय, अहिंसा का सार्वभौमिक ग्रंथ है, पूरे भारत में सम्मानित और वेदांत और भारतीय दर्शन से सहज जुड़ाव!
ऐसे सैकड़ों संतों का उदाहरण है , और हर सदी का है। यह सब एक ही बात सिद्ध करता है कि भारत एक संयुक्त सभ्यता है। यदि भारत में सचमुच “आर्य बनाम द्रविड़” जैसी नस्ली दुश्मनी होती, तो शंकर, रामानुज, बसवन्ना, माध्वाचार्य जैसी परंपराएँ पूरे भारत में क्यों फैलतीं?
दक्षिणी भाग के सुदूर मंदिर में गंगोत्री का जल और दक्षिणी भाग की सुपारी बदरीनाथ भगवान को अनादि काल से चढ़ती रही। भक्ति आंदोलन पूरे उपमहाद्वीप में एक जैसा कैसे हुआ?
देवी–देवता, दर्शन, कला, संगीत सबमें समानता कैसे?
सच्चाई एक वाक्य में! भारत कभी आर्य बनाम द्रविड़ नहीं था। यह विभाजन अंग्रेज़ों ने बनाया और विज्ञान ने उसे ख़ारिज कर दिया।
भारत एक ऐसी सभ्यता है! जहाँ उत्तर–दक्षिण–पूर्व–पश्चिम सब की सब दिशाओं का नाम है सब एक-दूसरे से हजारों वर्षों से जुड़े हुए हैं।
नमस्कार
🙏🌷🙏
नारायण नारायण नारायण नारायण

