गुरु नानक का पूरा परिवार ‘हिंदू-खत्री’ था। गुरु अंगद ट्रेहण खत्री, गुरु अमरदास भील्ला खत्री, गुरु रामदास और गुरु अर्जुन सोढ़ी खत्री, गुरु हरगोबिंद और गुरु तेग बहादुर सूर्यवंशी खत्री, और गुरु गोबिंद सिंह भीलौरिया खत्री; ये सभी जन्म से हिंदू थे। वेद, उपनिषद, पुराण, देवी-देवताओं, राम–कृष्ण–शिव परंपरा का सम्मान उनके जीवन में स्पष्ट दिखता है।
“हिंदू धर्म की रक्षा” उन्हें अपना धर्म और कर्तव्य लगता था; किसी अलग धर्म की रक्षा का विचार उस समय था ही नहीं।
पंज प्यारे- पाँचों हिंदू योद्धा थे
भाई दयाल दास (सारस्वत ब्राह्मण), भाई धर्म दास (जाट), भाई हिम्मत राय (नाई जाति), भाई मोहकम दास (धोबी), भाई साहिब चंद (खत्री); पाँचों जन्म से और पहचान से हिंदू। किसी ने अपनी हिंदू पहचान नहीं छोड़ी, न ही गुरु ने उनसे ऐसा कहा। उनकी दीक्षा, उनके नाम, उनकी जातियाँ, सब आपके सामने सत्य की तरह खड़ी हैं।
सिख बने हुए अधिकांश लोग भी स्वयं को हिंदू ही लिखते थे
इसका सबसे बड़ा कारण है कि हिन्दुओ का सबसे बड़ा बेटा ही सिख बनता था। ये प्रचलन आज भी हरियाणा, पंजाब और हिमाचल में देखा जा सकता हैं। और उसी बड़े बेटे के वंशज आज खुद को अलग कहे तो यह विडंबना ही कहेंगे!
खत्री, अरोड़ा, सोढ़ी, बेदी, चोपड़ा, वालिया, कपूर, अनेजा, गुलाटी, माहरा ये सभी परिवार गुरु परंपरा के भक्त थे। पर जनगणना, दस्तावेज़, विवाह–रसम, और समाज में अपनी पहचान हिंदू ही लिखते थे। आज भी लाखों सिख– खत्री और अरोड़ा परिवार अपनी सामाजिक पहचान हिंदू मानते हैं।
इसी तरह जाट सिखों का बड़ा वर्ग खासकर मालवा और दोआबा 19वीं सदी तक गुरुद्वारा जाता था, पर घर में हनुमान चालीसा, रामायण और भगवद्गीता पढ़ता था। दादा गुरुद्वारा जाता था, दादी मंदिर जाती थी। क्योंकि दोनों में कोई भेद माना ही नहीं जाता था। यह विभाजन अंग्रेज़ों के आने से पहले नहीं था।
उदासी पंथ
उदासी पंथ, जिसे गुरु नानक के पुत्र श्री चंद्र ने स्थापित किया था, पूर्ण रूप से हिंदू सन्यास परंपरा थी। उदासी साधु त्रिपुंड धारण करते थे, शिवभक्त थे, गीता–उपनिषद पढ़ते थे। अंग्रेज़ों ने बाद में उन्हें सिख पंथ से अलग करने के लिए अकालियों को आगे किया, जबकि वे मूलतः सनातन साधु ही थे।
उन्हीं अकालियों ने स्वर्ण मन्दिर से हिन्दू देवी देवताओं की मूर्तियां बाहर फेंकी अन्यथा उस समय स्वर्ण मन्दिर हिन्दुओ और सिखों की सामुहिक आस्था का केंद्र था। स्वर्ण मन्दिर में संत भी रहते थे और निहंग भी उसी छत्त के नीचे!
निहंग, जो आज भी अस्त्र-शस्त्र धारण कर अकाल तख्त की रक्षा करते हैं, उनके पूरे शस्त्र–धर्म की जड़ें दसनामी अखाड़ों और शैव परंपरा में हैं। निहंग आज भी महाकाली, भवानी, चंडी का पूजन करते हैं, जैसा गुरु हरगोबिंद और गुरु गोबिंद सिंह करते थे। आज भी कुम्भ में यह अखाड़े आते हैं!
इतना ही नहीं! गुरु गोबिंद सिंह स्वयं रामभक्त और देवी-भक्त थे। चंडी दी वार, विनय पत्रिका, शक्ति उपासना, देवी स्तुति ये सब उनके द्वारा रचित या निर्देशित ग्रंथ हैं। वे स्वयं घोषणा करते हैं—
“सकल जगत में खालसा पंथ गाजे, जागे धर्म हिंदू तुर्क भाजे …”
यह वचन स्पष्ट है! खालसा का उद्देश्य धर्म हिंदू को पुनर्जीवित करना था, न कि कोई नया धर्म बनाना।
महाराजा रणजीत सिंह का पूरा साम्राज्य सनातन संस्कृति पर आधारित था। उनकी ध्वजा पर देवी, सूर्य, हनुमान अंकित थे। उनके युद्ध शिव–हनुमान के नाम पर प्रारंभ होते थे। दुर्गा अष्टमी, रामनवमी, होली, दिवाली सब हिंदू त्योहारों को पूरे राजकीय सम्मान से मनाया जाता था।
बेदी और सोढ़ी कुल के हज़ारों परिवार आज भी खुद को हिंदू खत्री मानते हैं। काहन सिंह नाभा जैसे विद्वान अंग्रेज़ों के दबाव में ‘Ham Hindu Nahi’ लिखने के बावजूद अपने अन्य लेखों में लिखते हैं कि “हमारी जड़ें हिंदू हैं।”
लाखों पंजाबी परिवार (खत्री, अरोड़ा, भाटिया) गुरु ग्रंथ को गुरु मानते हैं, पर देवी–देवता, वेद–पुराण, राम–कृष्ण सबकी पूजा करते हैं।
अंग्रेज़ों ने 1860– 1920 के बीच ‘डिवाइड एंड रूल’ के अंतर्गत अकालियों को आगे कर “अलग सिख धर्म” गढ़ा। इससे पहले The Hindu, Civil and Military Gazette, Bombay Chronicle सहित कई अखबार लिखते थे- “Punjab में Hindu-Sikh में कोई धार्मिक भेद नहीं; दोनों एक ही सभ्यता के अंग हैं।”
इसका सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि 20वीं सदी के आरंभ तक 70% सिख विवाह हिंदू रीति–रिवाजों से होते थे। अग्नि के सात फेरे, वेद मंत्रों के साथ। अंग्रेज़ों ने 1909 में Anand Marriage Act पास किया ताकि हिंदू–सिख को दो अलग-अलग समूदाय दिखाया जा सके।
यह संघर्ष सिख बनाम हिंदू नहीं, बल्कि हिंदू_धर्म बनाम अत्याचार था
गुरु परंपरा के लोग, चाहे वे खालसा हों, निहंग हों, उदासी हों, संन्यासी हों, जाट, खत्री, राजपूत सभी हिंदू ही थे। जो सिख बने, वे भी स्वयं को हिंदू ही कहते थे। जो हिंदू रहे, वे भी वही गुरु परंपरा मानते थे।
इसलिए कहना कि “सिखों ने हिंदुओं को बचाया” इतिहास का अपमान है। सत्य यह है कि हिंदुओं ने ही हिंदुओं को बचाया, और गुरु परंपरा उसी सनातन धर्म की शौर्य-परंपरा का तेजस्वी पुनर्जन्म थी।

