साल 2026 कई मायनों में भारत के लिए महत्वपूर्ण है। आज से 1000 साल पहले भारत की सांस्कृतिक आत्मा के प्रतीक सोमनाथ मंदिर पर महमूद गजनवी ने आक्रमण किया था। कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी। भारत की अमरता को दिखाने के लिए अल्लामा इकबाल के इस ‘तराना-ए-ह हिंद’ का खूब प्रचार किया गया। लेकिन इकबाल से भी कई हजार साल पहले हमारे ग्रंथों में भारत की सांस्कृतिक आत्मा की अमरता को दिखाते हुए ‘नैनम छिंदती शस्त्राण नैनम दहती पावक’ की बात की गई है। हालांकि कुछ लोग इस श्लोक को सिर्फ आत्मा से जोड़कर देखते हैं। लेकिन आप बड़े लेवल पर देखेंगे तो एक राष्ट्र के रूप में भारत क्या है?
भारत सिर्फ जमीन का टुकड़ा भर तो है नहीं बल्कि यह एक आत्मा की तरह हम सबके अंदर बसा हुआ है। जिसे ना तो जलाया जा सकता है और ना ही मारा जा सकता है।
5 जनवरी की सुबह देश भर के तमाम बड़े अखबारों में तमाम बड़े पोर्टल्स पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विचार प्रकाशित हुए और प्रधानमंत्री ने देश को याद दिलाया कि वर्ष 2026 किस तरह से भारत की सांस्कृतिक अमरता को दिखाता है। वर्ष 2026 को 'सोमनाथ स्वाभिमान पर्व' बताते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने देश को यह याद दिलाया कि आज से हजार साल पहले सन 1026 ईस्वी में भारत की संस्कृति को नष्ट कर देने के उद्देश्य से आई कट्टर इस्लामिक सोच ने सोमनाथ मंदिर पर आक्रमण किया था तथा उसका भौतिक विध्वंस किया था। किंतु आज हजार वर्षों के उपरांत आप देखिए कि जो लोग भारत की संस्कृति को नष्ट करने आए थे आज उनकी जमीन तक उनको याद नहीं रख रही। जबकि दूसरी तरफ भारत ओ संस्कृति और सोमनाथ अपने पूरे वैभव के साथ खड़ा है।
हम सोमनाथ मंदिर और उससे जुड़े कुछ किस्सों के बारे में जानेंगे
जगतगुरु आदि शंकराचार्य ने द्वादश ज्योतिर्लिंग स्रोत की रचना की थी और उसमें भारत के 12 ज्योतिर्लिंगों का वर्णन किया। द्वादश ज्योतिर्लिंग का जो पहला श्लोक है वही भगवान सोमनाथ को समर्पित है। शंकराचार्य ने लिखा-
‘सौराष्ट्र देश विषदे तिरम्ये ज्योतिर्मय चंद्र कलावंतसम!
भक्ति प्रदानयाम कृपावतीर्णम त सोमनाथम शरणम प्रपद्य!’
प्रधानमंत्री मोदी ने भी अपने आर्टिकल में सौराष्ट्र सोमनाथम च का उल्लेख करते हुए सोमनाथ के महत्व को दिखाया है। ज्योतिर्लिंगों में सबसे पहले ज्योतिर्लिंग होने के कारण सोमनाथ मंदिर सनातनियों की आस्था का बहुत बड़ा केंद्र बनकर रहा और यही कारण था कि सनातन संस्कृति को मिटाने के उद्देश्य से आई बर्बर सभ्यताओं ने सोमनाथ मंदिर को अपना निशाना बनाया।
प्रसिद्ध इतिहासकार सीताराम गोयल जी की पुस्तक ‘इस्लाम वर्सेस हिंदू टेंपल्स’ में एक घटना पढ़ने को मिलता है। घटना कुछ ऐसा है कि जब महमूद गजनवी ने सोमनाथ मंदिर पर आक्रमण किया और वहां की मूर्तियों को गजनी ले जाने लगा तो सोमनाथ के हिंदुओं ने गजनी से कहा कि तुम तो सोमनाथ मंदिर का सोना लूटने आए थे। फिर हमारी मूर्तियां लेकर क्यों जा रहे हो? तुम हमारे शिवलिंग और हमारी मूर्तियां हमें दे दो। इसके बदले में हम तुम्हें और अधिक गोल्ड देने को तैयार हैं। लेकिन इस पर महमूद गजनवी ने हंसते हुए उन हिंदुओं की तरफ देखकर कहा था कि जब कयामत का दिन आएगा और मैं अल्लाह के सामने जाऊंगा तो मैं बुतफरोश होने की बजाय बुतशिकन कहलाना पसंद करूंगा।
उसके बाद महमूद गजनवी ने खुद अपने हाथों से कई मूर्तियों को तोड़ा और उनके टुकड़ों को मक्का, मदीना और बगदाद में भिजवाया ताकि उन जगहों तक भी यह संदेश भिजवाया जा सके कि हिंदुओं के सबसे पवित्र स्थानों में से एक सोमनाथ को तोड़ दिया गया है। हालांकि सोमनाथ मंदिर के पास इतना अथाह धन था कि महमूद गजनवी के बाद भी अनेक इस्लामी आक्रमणकारियों ने उस मंदिर को लूटा।
1300 ईसवी के आसपास खिलजीयों ने इस मंदिर पर आक्रमण किया। 1394 ईस्वी के आसपास गुजरात के गवर्नर जफर मोहम्मद खान ने इस मंदिर पर आक्रमण किया। 1471 ईस्वी में सुल्तान महमूद शाह जिसे महमूद बेगड़ा के नाम से भी जाना जाता है। उसने तो मंदिर से शिवलिंग हटाकर पूरे सोमनाथ मंदिर को ही मस्जिद में बदल दिया। लेकिन इन तमाम आक्रमणों के बावजूद भी यह मंदिर निर्भीक खड़ा रहा। क्योंकि एक तरफ इसे तोड़ने वाले कट्टर इस्लामी बुशिकन थे। तो वहीं दूसरी तरफ श्रद्धा से भरे हुए हिंदू राजा भी थे जो बार-बार इस मंदिर को बनवाते चले गए। कुमार पाल और रानी अहिल्याबाई होलनकर ने समय-समय पर इस मंदिर का पुनर्निर्माण करवाया। तो वहीं आजादी के बाद इस मंदिर का पुनर्निर्माण करवाने वालों की श्रेणी में सरदार वल्लभ भाई पटेल, केएम मुंशी और डॉ. राजेंद्र प्रसाद के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का भी नाम आता है। जिनके नेतृत्व में सोमनाथ का कॉरिडोर बन रहा है।
सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण की कहानी भी बहुत इंटरेस्टिंग है। लालकृष्ण आडवाणी जी की पुस्तक है ‘मेरा देश, मेरा जीवन’। उस पुस्तक में उन्होंने सोमनाथ मंदिर से संबंधित काफी मजेदार बातें लिखी हैं। उनमें से कुछ बातों का जिक्र मैं आपसे करूंगा।
‘1947 में जब भारत आजाद हुआ था तब भारत के हिंदुओं को यह लगा कि अब सोमनाथ मंदिर पूरी तरह से सुरक्षित हो चुका है और अब शायद इस देश के हिंदू अपने पहले ज्योतिर्लिंग सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण देखेंगे। लेकिन यह सब इतना आसान नहीं था। वर्ष 1947 में जब भारत आजाद हुआ था तो अंग्रेजों ने रियासतों को यह आजादी दे रखी थी कि कोई भी रियासत चाहे तो भारत से मिल सकता है चाहे तो पाकिस्तान से मिल सकता है और चाहे तो स्वतंत्र भी रह सकता है। सोमनाथ मंदिर जहां पर स्थित है, वह जो भूमि है वह जूनागढ़ रियासत में आती थी और जूनागढ़ रियासत की 80% जनसंख्या हिंदू थी। लेकिन उस रियासत का नवाब मुसलमान था। आजादी के पहले जूनागढ़ के नवाब ने अपनी रियासत को पाकिस्तान में मिलाने की घोषणा कर दी। अब जाहिर सी बात है कि 80% हिंदू जनसंख्या वाली रियासत जब पाकिस्तान में मिलेगी तो इसका विरोध तो होगा ही। विरोध हुआ। जूनागढ़ रियासत के हिंदू भड़क उठे और उन्होंने विद्रोह कर दिया। विद्रोह से परेशान होकर कोई रास्ता ना देखकर एक रात जूनागढ़ का नवाब चुपचाप पाकिस्तान भाग गया और जूनागढ़ रियासत को भारत में मिला लिया गया।
सोमनाथ मंदिर आखिरकार पूरी तरह से भारत सरकार के पास आया। जूनागढ़ के भारत में विलय के कुछ दिन बाद सरदार पटेल सौराष्ट्र के दौरे पर गए और वहां उनके सम्मान में एक सभा आयोजित की गई। उस सभा को संबोधित करते हुए सरदार पटेल ने यह घोषणा कर दी कि स्वतंत्र भारत की सरकार ऐतिहासिक सोमनाथ मंदिर का उसी स्थान पर पुनरुद्धार करेगी जहां पर प्राचीन काल में वह मंदिर स्थित था और उस मंदिर में ज्योतिर्लिंग भी स्थापित किया जाएगा। सरदार पटेल का यह बयान देश भर के हिंदुओं के लिए गौरव की बात थी।
लेकिन नेहरू के मंत्रिमंडल में शिक्षा मंत्री रहे मौलाना अबुल कलाम आजाद ने सरदार पटेल की इस बात का विरोध किया। उन्होंने कहा कि मंदिर का पुनरुद्धार कराने की जरूरत नहीं है। मंदिर जैसा है उसको वैसा ही रहने दिया जाए और इसको संरक्षित रखने के लिए मंदिर को आर्किलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया को सौंप देना चाहिए। लेकिन सरदार पटेल इस मंदिर को लेकर दृढ़ संकल्पित थे। उन्होंने मौलाना अबुल कलाम आजाद की इस बात का विरोध किया और यह कहा कि सोमनाथ मंदिर का पुनरुद्धार करने के बाद ही इस देश की हिंदू जनता की भावना का असली सम्मान हो सकेगा। जब तक सरदार पटेल जीवित थे। मजबूरी में नेहरू ने भी सरदार पटेल का उस समय तक विरोध नहीं किया।
लेकिन 15 दिसंबर 1950 को जैसे ही सरदार पटेल का दुर्भाग्यपूर्ण निधन हुआ, उसके बाद नेहरू खुलकर सोमनाथ मंदिर के पुनरुद्धार के विरोध में खड़े हो गए। नेहरू ने सोमनाथ मंदिर का कामकाज देख रहे अपने ही मंत्री केएम मुंशी को बुलाया और कहा कि मैं नहीं चाहता हूं कि आप सोमनाथ मंदिर के पुनरुद्धार की कोशिश करें। यह हिंदू नवजागरणवाद यानी हिंदू रिवाइवलिज्म है। लेकिन नेहरू के खुलेआम विरोध के बाद भी के एम मुंशी नहीं रुके। उन्होंने मंदिर का पुनर्निर्माण करवाया और पुनर्निर्मित सोमनाथ मंदिर के उद्घाटन के लिए तथा ज्योतिर्लिंग की प्राण प्रतिष्ठा के लिए उस समय के राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद को बुलाया।
नेहरू ने हालांकि राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद के सोमनाथ मंदिर जाने का विरोध किया, लेकिन राजेंद्र बाबू ने उनके विरोध की ओर ध्यान नहीं दिया। राजेंद्र बाबू सोमनाथ की प्राण प्रतिष्ठा में गए और वहां जाकर उन्होंने जो भाषण दिया। वह भाषण भारत के किसी भी राष्ट्रपति के द्वारा दिए गए सबसे महत्वपूर्ण भाषणों में से एक है। मैं आप सब से भी अनुरोध करूंगा कि आप डॉ. राजेंद्र प्रसाद के उस भाषण को सुनिए जो सोमनाथ मंदिर के उद्घाटन के अवसर पर उन्होंने दिया था। मैं पूरा भाषण तो खैर आपको यहां नहीं लिख पाऊंगा, लेकिन उस भाषण की कुछ लाइनें मैं आपको सुनाता हूं।
राजेंद्र बाबू ने कहा था कि ‘जिस तरह सृष्टि की रचना करने वाले ब्रह्मा भगवान विष्णु की नाभि में रहते हैं, उसी तरह मनुष्य के हृदय में धार्मिक आस्था का वास होता है जो संसार के बड़े-बड़े अस्त्र-शस्त्रों, बड़ी-बड़ी सेनाओं और सम्राटों की शक्ति से भी बढ़कर होता है। अपने ध्वशेषों से बार-बार खड़ा होने वाला सोमनाथ का यह मंदिर पुकार-पुकार कर दुनिया से कह रहा है कि जिसके प्रति लोगों के हृदय में अगाध श्रद्धा है, उसे दुनिया की कोई शक्ति नष्ट नहीं कर सकती..।”
आप राजेंद्र प्रसाद की पूरी स्पीच जब सुनेंगे तो आपको सोमनाथ के वैभव का तो पता चलेगा ही। साथ ही साथ आपको यह भी पता चलेगा कि आजादी के बाद इसका पुनर्निर्माण करना कितना जरूरी था। आजादी के बाद जब इस मंदिर का पुनरुद्धार कराया गया तो उसका पाकिस्तान ने भी विरोध किया था। पाकिस्तान के कराची में तो बकायदे एक जनसभा तक आयोजित की गई थी और वहां खुलेआम सोमनाथ मंदिर के बारे में बुरा भला कहा गया था।
सीताराम गोयल की ही पुस्तक ‘इस्लाम वर्सेस हिंदू टेंपल्स’ में एक और घटना का जिक्र आता है कि आजादी के बाद जब सोमनाथ मंदिर का पुनरुद्धार हुआ तो उस समय भारत के कई मुस्लिमों के बीच ऐसे पर्चे बांटे गए। जिस पर एक शेर लिखा था कि मंदिर तो सोमनाथ का तामीर हो गया। एक और गजनवी का फकत इंतजार है। इस तरह के ऐसे अनगिनत झंझवात इस मंदिर ने झेले हैं। फिजिकली और कल्चरली इस मंदिर को नष्ट करने के कई प्रयास किए गए हैं। लेकिन यह मंदिर नष्ट नहीं हुआ। क्योंकि यह मंदिर भारत की सांस्कृतिक आत्मा का प्रतीक है और हमारे शास्त्रों में कहा गया है ‘नयनम छिंदती शस्त्राण नैनम दहती पावका’ अर्थात आत्मा को भला कोई कैसे मार सकता है।
सोमनाथ मंदिर हमारी आत्मा है, जिसने समय-समय पर हम हिंदुओं के अंदर चेतना जगाने का काम किया है। आपको याद होगा 1990 के दशक में जब राम मंदिर आंदोलन अपने चरम पर था और लालकृष्ण आडवाणी के नेतृत्व में रथ यात्रा निकली थी तो उस रथ यात्रा की शुरुआत भी सोमनाथ के मंदिर से हुई थी। सोमनाथ से निकला हुआ वह आंदोलन 500 वर्षों की कठिन तपस्या के बाद सफल हुआ और भगवान राम अपने मंदिर में आए। तो इस देश के हिंदुओं को गर्व से यह कहना चाहिए कि सोमनाथ की गाथा सिर्फ विध्वंस की गाथा नहीं है बल्कि यह पिछले हजार वर्षों से चली आ रही सनातन के स्वाभिमान की भी गाथा है। हमारी अटूट आस्था की गाथा है।
आक्रमणकारी आए सब कुछ लूट कर लेकर चले गए। लेकिन सोमनाथ के प्रति हमारी भावना को हमसे नहीं छीन सके। आज हजार वर्षों के बाद भी भगवान सोमनाथ का मंदिर अरब सागर की ओर मुंह करके इतिहास की आंखों में आंख डालकर खड़ा है। सोमनाथ को छूती समुद्र की लहरें यह गवाही दे रही हैं कि समय चाहे जितना भी क्रूर क्यों ना रहा हो सनातन की धारा कभी रुकी नहीं। लहरें आती हैं टकराती हैं और लौट जाती हैं। लेकिन सोमनाथ वहीं खड़ा रहता है। जो इस्लामिक कट्टरपंथी विध्वंसक के रूप में आए थे वे मिट गए। उनके साम्राज्य मिट गए। उनकी क्रूरता मिट गई। लेकिन जिन हिंदुओं के पास आस्था थी, वे आज भी जीवित हैं। सोमनाथ आज भी खड़ा है।
प्रधानमंत्री मोदी ने भी अपने आर्टिकल में यही लिखा है कि सोमनाथ आज अगर वैभव के साथ खड़ा है तो वह अपने उस प्रतिरोध के कारण खड़ा है जो उसने कट्टर इस्लामिक सोच के प्रति दिखाई और वही प्रतिरोध आज भी हमें दिखाने की जरूरत है। आज भी आप देखिए तो भारत की संस्कृति पर चौतरफा आक्रमण हो रहे हैं। कहीं डेमोग्राफिक चेंज देखने को मिल रहा है। कई राज्यों में तो हिंदू अल्पसंख्यक हो गए हैं। हिस्टोरिकल नैरेटिव में भी क्फ्लिक्ट देखने को मिल रहा है। हमारे पर्व त्यौहारों को या तो नकार दिया जा रहा है या फिर दूषित कर दिया जा रहा है। कल्चरल कॉन्फिडेंस क्राइसिस देखने को मिल रहा है। अपनी ही संस्कृति पर, अपनी ही परंपराओं पर कुछ लोग शर्म महसूस कर रहे हैं। इसके अलावा फिजिकली भी भारत को हर जगह से तोड़ने की बात की जा रही है। कोई कश्मीर अलग करने की बात कर रहा है तो कोई चिकन नेक काटने की बात कर रहा है।
इस तरह की तमाम चुनौतियों से लड़ने के लिए सोमनाथ हमारे लिए एक इंस्पिरेशन का काम करेगा। सोमनाथ ने हमें बताया कि इससे भी भयानक हमले इस देश की संस्कृति पर हुए हैं। लेकिन हमने वह भी सर्वाइव किया। हम इतिहास में विक्टिम बनकर नहीं बल्कि विक्टर बनकर उभरे हैं। और यही सिविलाइजेशनल स्पिरिट हमें एक राष्ट्र के रूप में आगे लेकर जाएगी। हम हमलों से घबराने वाली सभ्यता नहीं है। हमें यह ध्यान रखना होगा कि तमाम बर्बर सभ्यताएं आई। इस देश को खा जाने के लिए आई। लेकिन हम ना तो झुके और ना ही डरे।
‘सब बुत उठवाए जाएंगे।
सब ताज उछाले जाएंगे।
सब तख्त गिराए जाएंगे।
बस नाम रहेगा अल्लाह का।
यह कहते हुए हमारे मंदिरों को तोड़ा गया। हमारी मूर्तियों को नष्ट किया गया। और ऐसा मान लिया गया कि इससे सनातन मिट जाएगा। और आज देखिए यह कहने वाले और यह करने वाले लोग मिट गए। इनकी नस्लें मिट गई। लेकिन हम बुत परस्त आज भी जीवित हैं। हमारे बुत आज भी हमारे पास हैं। हमारे ताज अब भी हमारे सिर पर हैं। हमारे तख्त अब भी हमारे लिए पूजनीय है। हमारी आस्था आज भी जीवित है। और हमारा सोमनाथ आज भी अडिक खड़ा है।
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