जिहादी टीपू का शर्मनाक सच | टीपू सुल्तान को देश के गद्दार इतिहासकारों ने "शेर-ए-मैसूर" या "मैसूर का बाघ" कहा और स्कूलों में यही पढ़ाया भी गया!

जिहादी टीपू का शर्मनाक सच | टीपू सुल्तान को देश के गद्दार इतिहासकारों ने "शेर-ए-मैसूर" या "मैसूर का बाघ" कहा और स्कूलों में यही पढ़ाया भी गया!

    लंदन स्थित ब्रिटिश लाइब्रेरी, जहां 'इंडियन ऑफिस रिकॉर्ड्स' में 18वीं शताब्दी की “ब्रिटिश-भारतीय संधियों” के मूल दस्तावेज़ रखे गए हैं। उसी में श्रीरंगपट्टनम में हुई संधि के पाठ की प्रतियां और संबंधित दस्तावेज़ आज भी सुरक्षित रखे हैं! जो चीख-चीख कर यह बताते हैं कि टीपू सुल्तान कितना निकृष्ट और नीच किस्म का कायर जिहादी था। देश के गद्दार देशद्रोही और आतंकी समर्थक इतिहासकारों ने कैसे उस कायर टीपू सुल्तान को शेर और बाघ के रूप में महिमामंडित किया। 

16 में में पुत्र को 2 अंग्रेजो के यहाँ गिरवी रखा था!

    लगातार तीसरे ‘आंग्ल-मैसूर युद्ध’ को हारने के बाद श्रीरंगपट्टनम की संधि हुई थी। इस संधि के अनुसार टीपू को अपने राज्य का एक हिस्सा अंग्रेजों को देना पड़ा था। इसके साथ 3.3 करोड़ रुपये युद्ध में हुई क्षति की पूर्ति के लिए दंड के रूप में जुर्माना भी देना पड़ा था।
    इस रकम को देने की गारंटी के लिए टीपू ने पहले अपने सोलह पुत्रो में से दो पुत्रों को अंग्रेजों के पास गिरवी रखा। टीपू सुल्तान के दोनों लौंडों के नाम थे-
  1. अब्दुल खालिक (उम्र करीब 10 साल)
  2. मुईनुद्दीन (उमर करीब 8 साल)
   अपने इन दोनों लौंडों को टीपू सुल्तान ने 26 फरवरी, 1792 को ब्रिटिश गवर्नर-जनरल लॉर्ड कॉर्नवालिस के पास गिरवी रख दिया था! 
  इन सभी घटनाओं को प्रत्यक्षदर्शी, मेजर एलेक्ज़ेंडर डिरोम (Major Alexander Dirom) ने अपने पुस्तक 'A narrative of the campaign in India, which terminated the war with Tippoo Sultan in 1792', (Bulmer and Co., London, 1794), pps. 228, 229, 230, 247) में विस्तृत रूप से वर्णन करते हुए लिखा है।
   1794 में टीपू द्वारा जुर्माने की पूरी रकम चुकाने के बाद अंग्रेजों ने उसके दोनों पुत्रों को वापस श्रीरंगपट्टनम लौटने दिया था। 
जिहादी टीपू का शर्मनाक सच | टीपू सुल्तान को देश के गद्दार इतिहासकारों ने "शेर-ए-मैसूर" या "मैसूर का बाघ" कहा और स्कूलों में यही पढ़ाया भी गया!
अपने 16 में से दो पुत्रो को अंग्रेज ब्रिटिश गवर्नर जनरल के पास गिरवी रखता हुआ टीपू
   कुछ वर्षों तक शांति का आनंद लिया, लेकिन 1799 में मैसूर और अंग्रेजों के बीच चौथा युद्ध फिर से 9ई हो गया। उस वर्ष 4 मई 1799 को मैसूर की राजधानी पर अंग्रेजो ने कब्जा कर लिया और टीपू सुल्तान को उनके 10,000 सैनिकों के साथ मार दिया गया। 
जिहादी टीपू का शर्मनाक सच | टीपू सुल्तान को देश के गद्दार इतिहासकारों ने "शेर-ए-मैसूर" या "मैसूर का बाघ" कहा और स्कूलों में यही पढ़ाया भी गया!
The Reception of the Mysorean Hostage Princes by Marquis Cornwallis, 26 February 1792 | Painted by- Dr D. N. McDonald, 1976
   उंसके लौंडो  को मेजर-जनरल डेविड बेयर्ड (Major-General David Baird) ने पकड़ लिया, और उसे वेल्लोर भेज दिया गया। 1806 में, मद्रास सेना के सैनिकों के बीच वेल्लोर में हुए विद्रोह के बाद, टीपू के लौंडो को टीपू के परिवार के बाकी सदस्यों के साथ कलकत्ता निर्वासित कर दिया गया। 
जिहादी टीपू का शर्मनाक सच | टीपू सुल्तान को देश के गद्दार इतिहासकारों ने "शेर-ए-मैसूर" या "मैसूर का बाघ" कहा और स्कूलों में यही पढ़ाया भी गया!
अन्य फोटो में टीपू अपने दो बेटों को गिरवी रखते हुए

   ज़रा सोचिए कि जो जिहादी युद्ध में शर्मनाक पराजय के बाद अपनी दो औलादों को अपने दुश्मन के पास गिरवी रख चुका था। उसे आज़ाद भारत में देश के गद्दार इतिहासकारों ने शेर और बाघ बता कर महिमा मंडित किया! बेशर्म कांग्रेसी उसकी जयंती पर नंगे होकर नाचने को बेताब रहते हैं।
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