वो 1987 का वर्ष था। राजस्थान के एक छोटे से गांव में कुछ ऐसा हुआ कि पूरा देश चौक गया। भारत ही नहीं, विश्व भर के अखबारों में उस गांव की चर्चा हुई। सीकर जिले के दिवराला गांव में 18 वर्ष की रूप कुंवर नाम की एक दुल्हन सती हो गई। रूपकुंवर के 24 वर्षीय पति की बीमारी से मौत हो गई थी। पति मालसिंह शेखावत की चिता के साथ रूप कुंवर भी भस्म हो गई।
रूप कुंवर का विवाह मात्र आठ महीने पहले हुआ था। पति के अंतिम संस्कार से पहले रूप कुवर ने सती होने की इच्छा जताई। दुल्हन की तरह सज धजकर तैयार हुई और शव यात्रा के आगे चलते हुए स्मशान घाट तक गई। रूप कुंवर चिता पर अपने पति का सिर गोद में लेकर बैठी और चिता की अग्नि में चलकर मर गई।
दिवराला और आसपास के हजारों लोग इस घटना के प्रत्यक्षदर्शी बने। गांव वालों का कहना था कि "रूप कुवर अपनी इच्छा से सती हुई। परिवार और बड़े बुजुर्गों ने उसे बहुत मनाया, लेकिन वह नहीं मानी।" लेकिन प्रशासन यह दलील मानने को तैयार नहीं था। ससुराल वालों समेत 32 लोगों पर हत्या का आरोप लगाया गया।
लंबी न्यायिक प्रक्रिया के बाद वर्ष 1996 में कोर्ट ने इन सभी को दोषमुक्त कर दिया। ऐसा कोई साक्ष्य नहीं मिला कि रूप कुवर को बलपूर्वक या बहला फुसलाकर पति की चिता पर बिठाया गया हो।
राजस्थान पुलिस ने 45 लोगों को सती के महिमा मंडन के आरोप में बंदी बनाया। उनमें भी अंतिम आठ लोग भी अक्टूबर 2024 में बरी कर दिए गए। इसके साथ ही लगभग चार दशक पहले पूरे देश को झकझोर देने वाली सती की घटना के विवाद का पटाक्षेप हो गया।
इस कानूनी लड़ाई ने हिंदू समाज के प्रति भारतीय शासन तंत्र के उस पूर्वाग्रह की पोल खोल दी। जिसकी नीव अंग्रेजों के समय रखी गई थी। रूपकुंवर-कांड के बहाने विश्व भर में प्रचार किया गया कि भारत में हिंदू अपनी महिलाओं को जिंदा जला देते हैं। सती को हिंदू धर्म की कुप्रथा बताते हुए इसके बारे में स्कूलों में पढ़ाया जाने लगा। कहा गया कि अंग्रेजों ने जिस सतीप्रथा पर प्रतिबंध लगाया था, वह आज भी चोरी छिपे चल रही है। इसकी आड़ में राजस्थान के राजपूत समुदाय को कलंकित करने के भी प्रयास हुए।
लेकिन सती प्रथा की सच्चाई आखिर क्या है?
इतिहासकार मीनाक्षी जैन ने भारत में प्राचीन काल से लेकर आधुनिक समय तक सती की सभी घटनाओं का अध्ययन किया। उन्होंने इसके आधार पर एक पुस्तक लिखी जिसका नाम है “सती इवेंजलिकल्स बापटिस्ट मिशनरीज एंड द चेंजिंग कॉलोनियल डिस्कोर्स”। ऐतिहासिक साक्ष्य और आंकड़ों के आधार पर यह पुस्तक बताती है कि “अंग्रेजों के समय किस प्रकार सती प्रथा का झूठ गढ़ा गया ताकि हिंदुओं को असभ्य और बर्बर सिद्ध किया जा सके।”
ऋग्वेद के एक मन्त्र के आधार पर दावा किया गया कि इसमें सती की बात है। जबकि वास्तव में वह एक “प्रश्न” है। जिसकी अगली ही ऋचा में कहा गया है कि-
“हे स्त्री उठो! इस मृत व्यक्ति को त्याग दो और जीवित प्राणियों में शामिल हो जाओ!” (ऋग्वेद १०:१८:8)
इसी से यह भी स्पष्ट है कि वेद विधवा विवाह की भी अनुमति देते हैं।
जिस मनुस्मृति को स्त्री विरोधी कहकर प्रचारित किया गया, वह आदेश देती है कि “पति की मृत्यु के बाद उसकी संपत्ति की स्वाभाविक उत्तराधिकारी उसकी पत्नी होगी।” यदि हिंदू धर्म में कभी सती प्रथा होती तो भला विधवा स्त्री को संपत्ति का अधिकार क्यों दिया गया होता?
सती नाम कहा से आया?
वेदों उपनिषदों, पुराणों जैसे सैकड़ों हिंदू धर्म ग्रंथों में कहीं भी सती का कोई वर्णन नहीं मिलता। भगवान शिव की पहली पत्नी का नाम सती था। उन्होंने अपने माँयके में स्वयं को योग-अग्नि में भस्म किया था। वह विधवा नहीं थी, उन्होंने अपने पति भगवान शिव के अपमान के पश्चाताप में स्वयं को जलाया था। उनकी तुलना सती-प्रथा से नहीं की जा सकती।
वैदिक काल से लेकर अंग्रेजों के आने तक के तमाम साहित्य और अन्य दस्तावेजों में किसी स्त्री के सती होने की कुल लगभग 500 घटनाएं मिलती हैं। सबसे पहली घटना महाभारत काल की है, जहां पांडु की दूसरी पत्नी माद्री सती हुई थी। वह भी किसी प्रथा के रूप में नहीं बल्कि इसलिए क्योंकि माद्री को लगता था कि वह अपने पति की मृत्यु की दोषी हैं। महाभारत में हजारों योद्धा मारे गए, लेकिन एक की भी पत्नी उसके साथ सती नहीं हुई।
महाभारत काल के बाद सती का जो पहला मामला मिलता है, वह सिकंदर के समय का है। ग्रीक इतिहासकार डायोडोरस ने लिखा है कि-
“सिकंदर की सेना की वापसी के समय उसके भारतीय कमांडर शशि गुप्त की मृत्यु हो गई। सिकंदर के सैनिकों ने आश्चर्य से देखा कि शशि गुप्त की दो पत्नियां इस बात के लिए लड़ रही हैं कि उसके शव के साथ आत्मदाह करने का अधिकार किसे है।”
इसके बाद पूरी छह शताब्दी तक किसी महिला द्वारा आत्मदाह का एक भी वर्णन नहीं मिलता। जबकि इसी दौरान प्राचीन भारत के ढेरों महान ग्रंथों की रचना हुई।
ईसवी वर्ष 510 में सती का एक वर्णन वर्तमान मध्य प्रदेश में मिलता है। यहां सागर जिले में एरण पाषाण स्तंभ में अंकित है कि-
“राजा भानुगुप्त के एक सरदार गोपराज की हत्या कर दी गई थी। उसकी विधवा द्वारा आत्मदाह की स्मृति में यह पत्थर लगाया गया है।”
इसके लगभग एक शताब्दी बाद 606 ईसवी में राजा हर्षवर्धन की मां रानी यशोमती की आत्मदाह का वर्णन मिलता है। लेकिन उन्होंने भी पति की मृत्यु से बहुत पहले ऐसा किया था। राजा हर्षवर्धन अपनी मां को तो रोक नहीं पाए थे, लेकिन जब उनकी बहन राजश्री विधवा हुई तो हर्षवर्धन ने उन्हें सती होने नहीं दिया।
सती का अगला वर्णन 700 से अधिक वर्ष बाद वर्तमान उत्तरी अफ्रीका के देश मोरक्को से आए इब्न बतूता के लेखन में मिलता है। इब्न बतूता ईसवी वर्ष 1333 से 1347 के बीच भारत में रहा था। वर्तमान मध्य प्रदेश के धार में उसने तीन महिलाओं के सती होने की चर्चा की है। यह भी बताया है कि उनके पति सिंध में किसी युद्ध में मारे गए थे।
इसी प्रकार राजा राजेंद्र चोल के समय में एक महिला के सती होने का शिलालेख मिलता है। इतिहासकार कल्हण की पुस्तक राज तरंगिणी में दसवीं से बारहवीं शताब्दी के बीच कुछ महिलाओं द्वारा सती होने की चर्चा मिलती है। इनमें से कई के सती स्तंभ आज भी मिलते हैं। मध्य प्रदेश में नर्मदा के आसपास कुछ सती स्तंभ मिलते हैं। यह सारे भील जनजाति के सरदारों की पत्नियों के नाम पर है।
भारत पर इस्लामी चंगुल मजबूत होने के 300 से 400 वर्षों में सती की इक्का-दुक्का घटनाएं मिलती हैं। उन सभी की पुष्टि वहां पर बने सती स्तंभों से होती है। पूरे भारत में ऐसे सती स्तंभों की संख्या कुछ 100 में ही है। यदि सती कोई बहुत बड़ी परंपरा होती तो उनके स्मृति स्तंभ हर गांव चौराहे पर मिलते।
सती की जो घटनाएं रिकॉर्डेड हैं, वे भी आवश्यक नहीं कि जलाई गई हो। कई ऐसी महिलाएं भी हैं जिनका पति के जाने के कुछ घंटे बाद स्वाभाविक रूप से निधन हो गया। कई बार जहर की घटनाओं को लोग सती से जोड़कर देखते हैं।
यह समझना आवश्यक है कि सती प्रथा जौहर से बिल्कुल अलग है। जौहर केवल इस्लामी आक्रमणों के समय प्रचलन में आया। क्योंकि युद्ध जीतने के बाद मुस्लिम सैनिक महिलाओं से बलात्कार करते थे। यदि कोई स्त्री जहर या किसी अन्य तरीके से आत्महत्या कर लेती थी, तब भी वे उनके शवों के साथ कुकर्म करते थे। मुसलमान उनके शव को भी छू ना सके, इसके लिए राजस्थान की स्त्रियां अपने लिए सबसे कष्टकारी मृत्यु चुना करती थी। इसी दौरान उनके पुरुष सिर पर केसरिया बांधकर युद्ध भूमि में बलिदान देते थे। जिसे साका कहा जाता था। जोहर पति-पत्नी के प्रेम का वह उच्चतम आदर्श है, जिसकी कल्पना भी आज की फर्जी फेमिनिस्ट नहीं कर सकती।
वर्ष 1754 में मालवा की रानी देवी अहिल्याबाई अपने पति के देहांत के बाद सती होना चाहती थी लेकिन उनके ससुर ने उन्हें ऐसा नहीं करने दिया। और तो और उन्हें राज्य के उत्तराधिकारी के रूप में भी तैयार किया। वर्ष 1839 में लाहौर में राजा रणजीत सिंह की चारों रानियां उनके साथ सती हुई थी। तब इसे अत्यंत दुर्लभ घटना की तरह वर्णित किया गया है।
भारत में सती प्रथा की असली कहानी आरंभ होती है, 19वीं सदी के आरंभिक दशकों में। ईस्ट इंडिया कंपनी के साथ बड़ी संख्या में बैप्स मिशनरी भी भारत आए थे। हिंदू धर्म को असभ्य और बर्बर सिद्ध करने के लिए मिशनरीज ने दो झूठ गढ़े। पहला यह कि हिंदू लोग अपने बच्चों की बलि देते हैं। दूसरा कि हिंदू पुरुष के मरने के बाद उनकी पत्नियों को जिंदा जला देते हैं।
इतिहासकार मीनाक्षी जैन ने अपनी पुस्तक में बताया है कि ईसाई मिशनरिया आरंभ में बच्चों की बलि वाली बात फैलाना चाहती थी। लेकिन उन्हें ऐसी एक भी घटना नहीं मिली। इसलिए मजबूरी में सती प्रथा को चुनना पड़ा। क्योंकि देश के अन्य क्षेत्रों में कुछ घटनाएं सुनने में आती रहती थी। मिशनरियों ने झूठे रिकॉर्ड्स तैयार किए- जिनके अनुसार हर वर्ष 10 से 20 हज्जार’ स्त्रियां केवल बंगाल में सती हो रही थी। इतिहासकार मीनाक्षी जैन ने जब इन दावों की जांच की तो पाया कि इनमें से लगभग सारी घटनाएं झूठ पाई गई। उनसे संबंधित कोई अन्य स्थानीय दस्तावेज साहित्य या सती स्तंभ नहीं मिलता।
अपनी पुस्तक में उन्होंने प्रश्न उठाया है कि सती प्रथा यदि इतनी ही सामान्य रूप से प्रचलित थी, तो बंगाल के किसी अन्य लेखक ने इस बारे में क्यों कुछ नहीं लिखा? केवल इवेंजलिकल और बैप्स मिशनरी ही क्यों लिख रहे थे?
सती पर ईसाई मिशनरियों द्वारा गढ़े जा रहे हास्यास्पद झूठों पर एक बड़ा उदाहरण यह पुस्तक है- “An Apology for Promoting Chrstinity in India” (Download) जिसके लेखक है Claudius Buchanan। वर्ष 1814 में लिखी इस पुस्तक में बताया गया है कि “बंगाल में एक ब्राह्मण की 100 पत्नियों में से 22 चिता में जल गई, उनकी चिता कई सप्ताह तक जलती रही। जहां के बारे में यह दावा किया गया, वहां के लोगों ने ऐसी किसी घटना के बारे में कभी सुना ही नहीं था।”
इस पुस्तक में हर मृत व्यक्ति की कई दर्जन पत्नियां होने और उनके चिता पर जलने की बात बताई गई है। बंगाल के तत्कालीन समाज के बारे में जानने वाला कोई व्यक्ति ऐसी दुष्टता पूर्ण किंतु हास्यास्पद बातें नहीं कर सकता। इस पुस्तक का पीडीएफ लिंक हमने दे दिया है। आप चाहे तो और पढ़कर हंस सकते हैं।
इसी दौरान ईसाई मिशनरियों ने बंगाल में राजा राममोहन रॉय को समाज सुधारक के रूप में स्थापित किया। यह व्यक्ति कोई राजा नहीं था, उसे ईस्ट इंडिया कंपनी ने यह उपाधि दी थी। उसने ब्रह्मसमाज नामक धार्मिक संगठन की स्थापना की। जिसके अंतर्गत वह एकेश्वरवाद का भ्रामक प्रचार करता था। साथ ही में वह तथाकथित सती प्रथा के विरुद्ध अभियान भी चलाता था।
बहुत बाद में लोगों को पता चला कि वे जिसे हिंदू समाज का सुधारक समझते रहे, वह एक क्रिप्टो क्रिश्चियन था। जो वर्ष 1833 में मरने के बाद इंग्लैंड के एक ईसाई कब्र में दफन है। आज यह बात लगभग स्थापित हो चुकी है कि राजा राम मोहन रॉय उसका ब्रह्म समाज और सती प्रथा के विरुद्ध अभियान वास्तव में एक धोखा था।
मीनाक्षी जैन की पुस्तक में सती को लेकर इन सारे षड्यंत्र के दो संभावित कारण बताए गए हैं। पहला यह कि अंग्रेज हिंदुओं के धर्मांतरण के लिए नैतिक आधार बनाना चाहते थे। किसी समुदाय को बर्बर और असभ्य सिद्ध करने से उन्हें लोगों को सही मार्ग पर लाने का नैतिक अधिकार मिल जाता है। दूसरा कारण यह कि ईसाई मिशनरियों नहीं चाहती थी कि पति की मृत्यु के बाद स्त्रियों को संपत्ति का अधिकार मिले।
हिंदू परंपरा में सारी संपत्ति पत्नी को मिलती थी। लेकिन अंग्रेजों ने जो कानून बंगाल पर थोपा, उसमें ईसाई परंपरा के अनुरूप स्त्रियों को संपत्ति के अधिकार से वंचित कर दिया गया। इसके कारण समाज में विधवाओं की स्थिति बहुत खराब होने लगी थी।
ठीक इसी समय यूरोप के ईसाई समाजों में महिलाओं और बच्चों की क्या स्थिति थी? उस पर हमारी डॉक्यूमेंट्री फिल्म के लिंक आप य पर इस वीडियो के डिस्क्रिप्शन में देख सकते हैं
बंगाल में सती के बारे में अंग्रेजों के आंकड़ों को थोड़ी देर के लिए सच भी मान ले तो 10 लाख की जनसंख्या पर चार महिलाएं सती हो रही थी। किसी भी समाज में आत्महत्या के आंकड़ों से इसकी तुलना करें तो यह संख्या कुछ भी नहीं है। फिर भी देखते ही देखते सती प्रथा से संबंध साहित्य रचा जाने लगा। ब्रिटिश अखबारों में इसके बारे में बढ़ा चढ़ाकर रिपोर्ट्स छपने लगी। ऐसा माहौल बना मानो भारत में महिलाओं के साथ बहुत बुरा व्यवहार हो रहा है। और यह ब्रिटिश सरकार की जिम्मेदारी है कि वह इसमें दखल दे।
यह विषय ब्रिटिश संसद में भी उठाया गया। आगे चलकर उसी के आधार पर गवर्नर विलियम बेंटिक ने सती प्रथा पर प्रतिबंध का कानून बना दिया। कानून बनते ही बंगाल में सती की घटनाएं अचानक पूरी तरह समाप्त हो गई। बंगाल में इसके बाद एक भी सती की घटना रिपोर्ट नहीं की गई। कहीं कोई विरोध भी नहीं हुआ। क्या कोई इस बात पर विश्वास करेगा कि सैकड़ों हजारों वर्षों से चल रही एक सामाजिक कुप्रथा मात्र एक कानून बनने से लुप्त हो गई? वो भी उस जमाने में जब सूचना संचार और प्रचार के अधिक माध्यम नहीं हुआ करते थे!
यह वही बंगाल था, जहां उन दिनों अंग्रेजों की गलत नीतियों के कारण लगभग हर वर्ष अकाल पड़ रहा था। जिन अंग्रेजों के कारण करोड़ों भारतीयों की भुखमरी से जान जा रही थी, उन्हें कुछ भारतीय स्त्रियों के कथित रूप से सती होने पर इतनी चिंता क्यों थी? भारत के स्वतंत्र होने के बाद सती की कुल लगभग 40 घटनाएं सामने आई। उनमें अधिकांश राजस्थान की थी। बंगाल में एक भी घटना नहीं हुई जहां पर सती की पूरी फर्जी कहानी गढ़ी गई थी। यह संख्या इतनी नहीं कि इसके लिए पूरे समाज को कलंकित किया जाए।
जितनी महिलाएं सती हुई, उससे कई गुना अधिक पुस्तकें ईसाई मिशनरियों और वामपंथियों द्वारा लिखी जा चुकी हैं। स्कूली पुस्तकों में आज भी इसे हिंदू धर्म की कुप्रथा के रूप में पढ़ाया जाता है। भारतीय समाज में विवाह एक संस्कार है और स्त्री को पुरुष की अर्धांगिनी माना गया है। यही उन दोनों के बीच प्रेम का आधार हुआ करता था। आज भले ही वे संस्कार लुप्त हो रहे हो, लेकिन एक समय था जब माना जाता था कि पति और पत्नी का संबंध जन्म जन्मांतर का है।
एक दो पीढ़ी पहले तक हमारे समाज में इसके ढेरों उदाहरण मिलते हैं। जब पति या पत्नी के निधन के कुछ समय बाद ही दूसरे की भी स्वाभाविक मृत्यु हो जाती थी। आप ने भी अपने परिवार या पास पड़ोस में ऐसा देखा होगा। संभवतः यही वह भाव है जिसके कारण सती होने वाली स्त्रियों को समाज ने सम्मान की दृष्टि से देखा और उन्हें देवी माना। ऐसा नहीं है कि पति के शव के साथ जलने की घटनाएं बिल्कुल भी नहीं हुई। अक्सर कुछ महिलाएं भावाबेश में या अपने भविष्य की चिंता में ऐसा करती थी। लेकिन यह कहना अनुचित है कि यह कोई सामान्य रूप से प्रचलित परंपरा थी।
सती की जो भी घटनाएं हुई, वे नहीं होनी चाहिए। क्योंकि हिंदू धर्म किसी भी रूप में आत्महत्या की अनुमति नहीं देता। हजार वर्ष की इस्लामी और ईसाई गुलामी में हिंदू धर्म में कई कुरीतियां आई। लेकिन जितनी तेजी से हिंदुओं ने अपने अंदर सुधार किया, वह विश्व के सभी समाजों के लिए उदाहरण है। सती प्रथा के नाम पर हिंदू धर्म को नीचा दिखाने का प्रयास अब और स्वीकार नहीं किया जा सकता।

