दरअसल गौतम बुद्ध के कुल (शाक्यवंश) को इस बात का अहंकार हो गया था कि वे मनुष्यों मे सबसे ऊँचे हैं। पहली बात तो शाक्य खुद को "महासम्मत (मनु)" का वंशज मानते थे, और दूसरी बात की गौतम बुद्ध ने जब उपदेश देना शुरू किया तो उनके सम्पर्क मे आने वाले बड़े-बड़े राजा-महाराजा भी बुद्ध के शिष्य बन जाते थे! अब चूँकि बुद्ध शाक्यकुल मे पैदा हुये थे, अतः शाक्यों को घमण्ड हो गया कि हम मनुष्यों मे सबसे श्रेष्ठ हैं।
शाक्यकुल का घमंड
बुद्ध के समय मे ही कौसल नामक राज्य मे प्रसेनजित (पसेनदि) नाम का राजा राज्य करता था, जो बुद्ध का अनन्य अनुयायी भी था। प्रसेनजित ने एक बार सोचा कि यदि मै शाक्यकुल की किसी लड़की से विवाह कर लेता हूँ, तो बुद्ध के साथ मेरा जुड़ाव और भी मजबूत हो जायेगा, और वे मेरे सम्बन्धी भी बन जायेंगे। जो मेरे लिये गौरव की बात होगी! यही सोचकर प्रसेनजित ने अपने दूत से विवाह का प्रस्ताव कपिलवस्तु के शाक्यों के पास भेज दिया।
जब शाक्यों को यह खबर मिली की कौसलराज किसी शाक्य-कन्या से विवाह को इच्छुक है। तब शाक्यों ने आपस मे मंत्रणा करना शुरू कर दिया! फिर उनमे कुछ बुजुर्ग शाक्यों ने कहा कि “हमारा कुल, कौसलराज के कुल से श्रेष्ठ है! अतः हम प्रसेनजित से किसी शाक्य कन्या का विवाह नही करेंगे।”
शाक्यकुल का प्रसेनजित से छल
लेकिन प्रसेनजित एक ताकतवर राजा भी था, अतः वह नाराज न हो, यही सोचकर शाक्यों ने सीधे इनकार करने का खतरा भी मोल लेना उचित नही समझा। फिर उन्होने एक योजना बनायी। एक शाक्य, जिसने अपनी दासी से नाजायज सम्बन्ध बना रखा था, उसी दासी से पैदा हुई दासी-पुत्री का विवाह प्रसेनजित से यह बोलकर कर दिया गया कि यह शाक्य कन्या है।
राजा प्रसेनजित इस झूठ से अनभिज्ञ था, और उसने दासी-पुत्री को शाक्य-कन्या ही समझा, तथा बुद्ध के कुल का समझकर उसे अपनी पटरानी भी बना दिया।
कुछ समय बाद प्रसेनजित को उस दासी-कन्या से एक पुत्र विडूडभ पैदा हुआ। जब थोड़ा समझदार हुआ, तब उसने अपनी माँ से अपने ननिहाल जाने की इच्छा जतायी, पर उसकी माँ ने यह कहकर मना कर दिया कि बहुत दूर है, अतः मत जाओ। लेकिन जब विडूडभ 16 वर्ष का हुआ तब उसने फिर से ननिहाल जाने का मन बनाया! उसकी माँ ने इस बार भी तरह-तरह के बहाने किये, पर विडूडभ न माना, और अन्ततः अपने ननिहाल कपिलवस्तु आ गया।
ननिहाल आने पर विडूडभ का न तो राजकुमारों जैसा स्वागत हुआ और न ही ठहरने के लिये उचित व्यवस्था की गयी। इसके विपरीत विडूडभ जिस आसन पर बैठता था, एक दासी आकर उसे धो देती थी। विडूडभ जिस बिस्तर पर सोता था, उसे बाद मे दासी साफ कर देती थी। यह व्यवहार विडूडभ को बहुत अजीब सा लगता था।
एक दिन विडूडभ के एक अंगरक्षक ने उसी दासी को यह बड़बड़ाते सुन लिया कि "पता नही यह दासी-पुत्री का बेटा कब यहाँ से जायेगा! यह जहाँ ठहरता है, मुझे वहाँ सफाई करनी पड़ती है, और इसकी वजह से मेरा काम बढ़ गया है"
अंगरक्षक ने आकर सारी बात विडूडभ को बतायी! इसके बाद विडूडभ को सारी सच्चाई समझ आ चुकी थी। विडूडभ समझ गया था कि उसके पिता के साथ शाक्यों ने छल किया और धोखे से एक दासी-पुत्री का विवाह कर दिया था।
विडूडभ का शाक्यो के विनाश का प्रण
विडूडभ गुस्से से पागल हो गया, और कौसल वापस लौट आया। कालान्तर मे जब विडूडभ कौसल का राजा बना तो उसने अपने अपमान और अपने पिता के साथ हुये छल का बदला लेने के लिये शाक्यों के समग्र विनाश का प्रण कर लिया। फिर क्या था! विडूडभ एक विशाल सेना लेकर शाक्यों पर हमला करने निकल पड़ा! यह समाचार जैसे ही बुद्ध को मिला तो वे भागे-भागे विडूडभ के पास पहुँचे और उन्होने विडूडभ को मार्ग मे ही रोक लिया।
बुद्ध ने विडूडभ को अपनी दीक्षा तथा गुरू-परम्परा का वास्ता देकर समझाया-बुझाया और उसे मार्ग से ही वापस राजधानी लौटा दिया! विडूडभ बुद्ध के समझाने से वापस तो लौट गया, पर शाक्यों पर उसका क्रोध शान्त न हुआ। थोड़े दिनों के उपरान्त विडूडभ का गुस्सा फिर भड़का और उसने फिर अपनी सेना लेकर शाक्यों पर चढ़ाई कर दी।
बुद्ध के शिष्यों ने फिर से बुद्ध को जानकारी दिया कि आपका ही शिष्य आपके कुल का विनाश करने के लिये फिर से जा रहा है। बुद्ध फिर गिरते-भागते विडूडभ के पास आये, और उसे समझाने लगे। पर विडूडभ एक नही मान रहा था। फिर बुद्ध ने विडूडभ से कहा कि यदि तुम्हे शाक्यों को मारना है तो मेरे ऊपर से सेना लेकर जाओ, क्योंकि मै भी तो एक शाक्य ही हूँ।
बुद्ध के ऐसा कहने पर विडूडभ फिर से सेना के साथ राजधानी वापस आ गया! इसी तरह तीन बार बुद्ध विडूडभ की सेना और कपिलवस्तु के बीच खड़े हुये और विडूडभ लौट गया। लेकिन कुछ महीनों बाद विडूडभ ने चौथी बार निश्चित किया कि शाक्यों को मारना ही पड़ेगा! और उसने ठान लिया कि यदि इस बार बुद्ध भी बीच मे आये तो सबसे पहले उन्हे ही मार दूँगा!
बुद्ध को भी किसी शिष्य ने जानकारी दिया कि विडूडभ अपनी सेना के साथ शाक्यों को मारने जा रहा है, और उसने निश्चय किया है कि यदि आप बीच-बचाव करने गये तो सबसे पहले आपको ही मार डालेगा। बुद्ध डर गये! तथाकथित शान्ति के मसीहा ने बीच मे आने से खुद को रोक लिया! और पिता के साथ हुये छल से क्रोधित हुये विडूडभ ने बुद्ध के खानदान के साथ-साथ समस्त शाक्यों का विनाश कर दिया।
आज के दौर मे कहा जाता है कि बुद्ध के संदेश दुनिया मे शान्ति स्थापित कर सकते हैं! पर स्वयं बुद्ध अपने जीते-जी एक राजा को अपने ही कुल का रक्तपात करने से न रोक सके। जिस बुद्ध ने अंगुलिमाल जैसे क्रूर डकैत को उपदेश देकर हिंसा करने से रोक लिया था, वही बुद्ध विडूडभ जैसे राजपुत्र को समझाने मे नाकाम रहे।
उक्त घटना “डी.डी. कोसम्बी” के साहित्य, और धम्मपद (वग्ग-4/47) मे लिखी है।


