जिन्ना ने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी AMU को क्यों कहा 'पाकिस्तान का शस्त्रागार'

जिन्ना ने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी AMU को क्यों कहा 'पाकिस्तान का शस्त्रागार'
     
इसमें कोई शक नहीं कि देश के बंटवारे का सबसे बड़ा जिम्मेदार कोई इंसान है तो वो है मोहम्मद अली जिन्ना! इसलिए जब भी किसी विभाजनकारी राजनीति की बात होती है तो जिन्ना का जिक्र या जिन्ना का जिन्न सबसे पहले उभर कर सामने आता है। 
   पाकिस्तान के निर्माण में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी की एक बहुत बड़ी भूमिका थी। 1940 में जब पाकिस्तान की मांग पहली बार उठी, उसी के बाद से एएमयू में पाकिस्तान के समर्थन में आवाजें उठना शुरू हो गई थी। 1942-46 तक आते-आते अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के ज्यादातर छात्रों पर पाकिस्तान का रंग चढ़ गया था। यहां तक कि यह छात्र मुस्लिम लीग के लिए प्रचार भी करते थे। यही वजह है कि मोहम्मद अली जिन्ना ने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी को पाकिस्तान का शस्त्रागार कहा था।

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी का जिन्ना और पाकिस्तान से क्या रिश्ता है? 

   यह जानने के लिए आपको ब्रिटेन की मशहूर इतिहासकार यासमीन खान की बेस्ट सेलर पुस्तक ‘द ग्रेट पार्टीशन द मेकिंग ऑफ इंडिया एंड पाकिस्तान पढ़ना चाहिए। ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में इतिहास की एसोसिएट प्रोफेसर यासमीन खान अपनी इस पुस्तक के पेज नंबर 39 से लेकर 41 तक जो लिखती हैं, उसे आप ध्यान से पढ़िए। वो लिखती हैं कि.. 
    “दूसरे विश्वयुद्ध से ही मुस्लिम लीग और पाकिस्तान के जबरदस्त समर्थक के रूप में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी की पहचान होती थी और यही इसकी खूबी थी। जिन्ना ने एएमयू को पाकिस्तान का शस्त्रागार कहा था और इसके छात्र पाकिस्तान समर्थक विचार को धार देते थे। बाद में इन छात्रों ने पाकिस्तान बनाने का श्रेय भी लिया। 1946 में जब जिन्ना और लियाकत अली खान अलीगढ़ आए तो उनका अभूतपूर्व स्वागत किया गया। एएमयू के छात्रों ने जिन्ना और लियाकत अली को कंधे पर उठा लिया था और उनके स्वागत में खूब पटाखे फोड़े गए थे!”
   यास्मीन खान ने लिखा है कि जिन्ना के आने पर अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में किस तरह से पटाखे छोड़े जाते थे। इतना ही नहीं! इतिहासकार यासमीन खान के मुताबिक अलीगढ़ की कई महिलाओं ने उस दौर में पाकिस्तान के लिए अपने गहने तक दान किए। लेकिन पाकिस्तान बनने के बाद भी अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी और पाकिस्तान के जो गहरे रिश्ते थे, उन पर सवाल उठते रहे। यह बात मैं ऐसे ही नहीं कह रहा हूँ।  हम हर बात संदर्भ, प्रसंग और उदाहरण के साथ बताते हैं। 

देश के स्वतंत्रता के बाद अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में पाकिस्तान सेना भर्ती कैंप 

   तो बात अक्टूबर 1947 की है। यानी आजादी के ठीक दो महीने बाद अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (AMU) में बकायदा पाकिस्तान सेना की तरफ से एक भर्ती कैंप लगाया गया था। और इसके पोस्टर पूरे अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में चिपकाए गए थे। यह सब एएमयू के तत्कालीन वाइस चांसलर की देखरेख में हो रहा था। अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में हो रही इस देश विरोधी घटना पर देश के गृहमंत्री सरदार पटेल की भी नजर थी। उन्होंने इस बारे में उत्तर-प्रदेश के तत्कालीन मुखिया यानी उस वक्त के मुख्यमंत्री गोविंद वल्लभ पंत को आगाह किया था। इसके जवाब में जीबी पंत ने 21 अक्टूबर 1947 को सरदार पटेल को एक पत्र लिखा। यह पत्र प्रकाशित हुआ है- ‘सरदार पटेल मुसलमान और शरणार्थी’ नाम की पुस्तक में। 
   पंत ने जो पटेल को लिखा था, उसे आपको बहुत ध्यान से पढ़ना चाहिए। इस पुस्तक के पेज नंबर 90 के मुताबिक- “पंत ने इस पत्र में सरदार पटेल के लिए लिखा कि मुझे 17 अक्टूबर को आपका पत्र मिला, जिसमें आपने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से पाकिस्तान फौज में अधिकारियों की भर्ती के बारे में लिखा था। बहरहाल कुछ समय पहले ही मेरा ध्यान भी इस और गया था कि पाकिस्तान फौज में भर्ती के लिए एएमयू के वाइस चांसलर को पाकिस्तानी सेना के मुख्यालय ने एक पत्र भेजा था। इस पत्र पर एक्शन लेने के लिए वाइस चांसलर ने एएमयू के कैप्टन एस.एम. अली को जिम्मेदारी सौंपी थी। इसके बाद कैप्टन अली ने एएमयू के छात्रों को बुलाया और पाकिस्तानी सेना के लिए आवेदन देने के लिए कहा। छात्रों के लिखित आवेदन प्राप्त कर लिए गए हैं और पाकिस्तानी फौज के लिए चुने जाने वाले छात्रों की लिस्ट भी तैयार कर ली गई है। इन दस्तावेजों की प्रामाणिकता पर सवाल नहीं उठाए जा सकते हैं। बहरहाल मैंने कलेक्टर को एएमयू पर एक्शन लेने के लिए बोल दिया है। साथ ही मैंने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय को चेतावनी भी दी है।” 
    तो सोचिए कितना गंभीर मामला था! यह जब पाकिस्तान की सेना अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में भर्ती कैंप लगा रही थी, तब ठीक उसी वक्त उसने कश्मीर पर भी आक्रमण किया था। एएमयू के इस कारनामे पर गोविंद वल्लभ पंत 21 अक्टूबर 1947 को सरदार पटेल को पत्र लिखते हैं और इसके ठीक अगले दिन यानी 22 अक्टूबर 1947 को पाकिस्तान की सेना कश्मीर पर आक्रमण कर देती है। सोचिए आजादी के बाद अलीगढ़ में इतनी बड़ी साजिश रची जा रही थी।  

नेहरू का अलीगढ़ यूनिवर्सिटी पर विचार

   अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी और मुस्लिम लीग के घनिष्ठ रिश्तों की जड़ कितनी गहरी थी! यह समझने के लिए हम आपके सामने एक ऐसे व्यक्ति के विचार लेकर आ रहे हैं, जिनकी धर्म निरपेक्षता पर कोई सवाल नहीं उठा सकता। मैं बात कर रहा हूं देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू की। नेहरू अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी की विचारधारा पर क्या विचार रखते थे? ये जानना हम सबके लिए बहुत जरूरी है। और नेहरू के यह विचार हमें मिल मिलते हैं उनकी लिखी मशहूर पुस्तक ‘डिस्कवरी ऑफ इंडिया’ में। खुद जवाहरलाल नेहरू ने डिस्कवरी ऑफ इंडिया के पेज नंबर 403 पर अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के बारे में लिखा है कि- 
   “अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी की परंपरा राजनीतिक और सामाजिक दोनों ही नजर में दकियानूसी यानी कंजरवेटिव थी। एक के बाद एक अंग्रेज प्रिंसिपल के अंदर रहकर यहां अलगाववाद और देश के खिलाफ रुझान पैदा हो गया। यहां के विद्यार्थियों के सामने सरकारी नौकरियां पाने का खास मकसद रखा गया। ऐसे में यहां देशभक्ति और बगावत यानी अंग्रेजों के खिलाफ बगावत की कोई गुंजाइश नहीं थी। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय ने कभी-कभी खुलेआम और ज्यादातर पर्दे के पीछे से हर मुस्लिम आंदोलन पर असर डाला है और मुस्लिम लीग का जन्म हुआ!” 
   बहुत ध्यान से पढिये! पंडित जवाहरलाल नेहरू कह रहे हैं कि मुस्लिम लीग का जन्म इन्हीं कोशिशों का नतीजा था यानी पंडित जवाहरलाल नेहरू का कहना है कि अलीगढ़ में जो विचारधारा थी, उसी की वजह से मुस्लिम लीग का जन्म होता है। तो नेहरू ने भी अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी की सोच को दकियानूसी, अलगाववादी और देशभक्ति से दूर बताया था। 

इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग का जिन्ना की मुस्लिम लीग से क्या कनेक्शन है?

   हम आपको बता चुके हैं कि आखिर अलीगढ़ की मुस्लिम यूनिवर्सिटी का जिन्ना और पाकिस्तान से क्या कनेक्शन था! जिन्ना और अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी और मुस्लिम लीग के घनिष्ठ रिश्तों की जड़े कितनी गहरी रही हैं, आपको बता बता चुके हैं। 
  अब आइए जानते हैं कि केरल की इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग और देश के दो टुकड़े करने वाली जिन्ना की मुस्लिम लीग में कोई समानता है या नहीं!  तो आइए सीधे चलते हैं 40 के दशक में जब जिन्ना की मुस्लिम लीग एक अलग देश पाकिस्तान की मांग कर रही थी। उस समय दक्षिण भारत में जिन्ना की मुस्लिम लीग अपने पांव फैला चुकी थी। जहां मुस्लिम लीग के दो बड़े नेता हुआ करते थे, इनमें सबसे बड़े नेता का नाम मोहम्मद इस्माइल और दूसरे थे बी. पोकर साह बहादुर! मोहम्मद इस्माइल को जहां दक्षिण भारत का जिन्ना कहा जाता था! वहीं पोकर बहादुर को जिन्ना का आंख, कान, नाक माना जाता था। 
उपरोक्त तस्वीर आप देखिए! बी. पोकर साह बहादुर और जो दाढ़ी में दिखाई दे रहे हैं। इस्माइल खान और यह दोनों जिन्ना के खास चेले थे और इस्माइल खान साहब को तो दक्षिण भारत का जिन्ना भी बोला जा रहा था।
    अब आप सोच रहे होंगे कि मैं जिन्ना के इन दोनों चेलों की बात क्यों कर रहा हूं? दरअसल इन दोनों ने ही मिलकर भारत की आजादी के बाद या यूं कहे कि भारत के बंटवारे के बाद 1948 में ‘ऑल इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग’ की स्थापना की थी। यानी जिन्ना की मुस्लिम लीग का नाम बदलकर ‘इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग’ रख लिया गया यानी जिन्ना की पार्टी का नाम था ‘मुस्लिम लीग’! उसके आगे लगा दिया गया ‘इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग’ और इस तरह से ये पार्टी सो कॉल्ड तरीके से धर्मनिरपेक्ष हो गई। जैसा कि राहुल कहते हैं। 
राहुल गांधी मुस्लिम लीग को सेक्युलर बताया
    और इसके बाद इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग राहुल गांधी के लिए नैया की तरह काम करती है। मुस्लिम लीग के समर्थन से जैसा कि मैंने आपको पहले बताया था कि वह वायनाड लोकसभा सीट से पहले 2019 और इसी साल 2024 में चुनाव जीत चुके हैं। 

ऑल इंडिया यूनियन मुस्लिम लीग ने अलग मुस्लिम देश ‘मोपलिस्तान’ की मांग किये थे

   अब आपको कांग्रेस की सहयोगी पार्टी ऑल इंडिया यूनियन मुस्लिम लीग के संस्थापक मोहम्मद इस्माइल का एक और सच बताना बहुत जरूरी है। दरअसल जून 1947 में जब देश के बंटवारे पर मोहर लग गई थी, तो दक्षिण भारत के जिन्ना कहे जाने वाले मोहम्मद इस्माइल ने एक नया दाव चला। उन्होंने दक्षिण भारत के केरल में एक अलग मुस्लिम देश की मांग की थी, और इस देश का नाम उन्होंने प्रस्तावित किया था ‘मोपलिस्तान’। मोहम्मद इस्माइल की यह मांग प्रकाशित हुई थी मुस्लिम लीग के मुखपत्र ‘डॉन’ में और वो तारीख थी 18 जून 1947। 
   अब डॉन में छपी इस खबर को आप बहुत ध्यान से पढ़िए । इसमें मोहम्मद इस्माइल के हवाले से जो लिखा गया है, वह बहुत महत्वपूर्ण है। डॉन में उस दिन खबर छपी थी कि- ‘मद्रास प्रोविंस के मुस्लिम लीग के अध्यक्ष मोहम्मद इस्माइल ने एक अलग मुस्लिम देश ‘मोपलिस्तान’ बनाने की मांग की है। उनका कहना है कि मोपला मुस्लिमों की नस्ल हिंदुओं से अलग है और वे अरबों के वंशज हैं। मोपला मुस्लिमों का धर्म ही नहीं बल्कि उनकी संस्कृति और उनका रहन-सहन इस इलाके के बाकी हिंदुओं से अलग है। मालाबार यानी केरल का मालाबार की कुल जनसंख्या 15 लाख है, जिसमें से 9 लाख मोपला मुसलमान है। यह इलाका यूरोप के अल्बानिया से भी बड़ा है, लिहाजा इसे एक अलग देश बनाया जाए।” 
   तो सोचिए! भारत का जब बंटवारा तय हो गया था, तब मोहम्मद इस्माइल वो हैं, जिन्होंने इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग की स्थापना की। जिसे आज राहुल गांधी धर्म निरपेक्ष बताते हैं। उसका संस्थापक यह कह रहा था कि केरल के अंदर मुसलमानों के लिए एक ‘मोपलिस्तान’ नाम से एक अलग देश बनाना चाहिए। यानी भारत में कई पाकिस्तान बनाने की तैयारी हो रही थी।
    अगर आपको लगता है कि तन मन धन से पाकिस्तान बनाने में योगदान देने वाले मोहम्मद इस्माइल खान और बी. पोकर शाह बहादुर जैसे जो जिन्ना के चेले थे, वे पाकिस्तान चले गए होंगे तो आप गलत है। ये दोनों भारत में ही रहे और इन्होंने 10 मार्च 1948 को भारत में इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग का गठन किया और उसके बाद आजाद भारत में पोकर बहादुर दो बार सांसद चुने गए। वहीं मोहम्मद इस्माइल खान एक बार राज्यसभा सदस्य और तीन बार लोकसभा का चुनाव जीते।
   केरल की मुस्लिम लीग आज भले ही खुद को जिन्ना की मुस्लिम लीग से अलग बताती हो, लेकिन जिन्ना की तरह ही उसका भी इतिहास मौका परस्ती का रहा है। वो कभी कांग्रेस तो कभी कम्युनिस्ट पार्टी का दामन थामती रही है। 
   1957 में केरल में इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग ने वामपंथ सरकार (जो नंबूदिरीपाद की थी) के साथ हाथ मिला लिया। शंकरन नंबूदिरीपाद की सरकार गिरने के बाद 1960 में मुस्लिम इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग ने कांग्रेस से हाथ मिला लिया और फिर जिन्ना के करीबी रहे केएम सीठी को 1960 में केरल विधानसभा का अध्यक्ष बना दिया गया। ध्यान रहे कि इस समय तक पंडित जवाहरलाल नेहरू जिंदा थे। उसके बाद 1977 में केरल विधानसभा चुनाव में मुस्लिम लीग और कांग्रेस गठबंधन को जीत मिली। 1979 में कांग्रेस के समर्थन से मुस्लिम लीग के नेता सीएच मोहम्मद कोया केरल के मुख्यमंत्री बने। 

मोहम्मद कोया का इतिहास क्या था?

   मोहम्मद कोया ने 1945 में कालीकट में मुस्लिम लीग के नेता और पाकिस्तान के पहले प्रधानमंत्री लियाकत अली खान का जबरदस्त स्वागत किया था। मोहम्मद कोया 1947 में मुस्लिम लीग की मलयाली मुखपत्र ‘चंद्रिका’ में भी बड़े पद पर का काम करते थे। 


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