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प्रोफेसर प्रियंका त्रिपाठी
“हिंदू समाज में बलात्कार एक साधारण घटना है क्योंकि पितृसत्तात्मक समाज की संरचना ही उसे सामान्य साधारण बनाती है। हिंदू समाज में लड़कियों के यौन शोषण का बीज तो घर में ही पड़ जाता है।” आईआईटी पटना में अंग्रेजी पढ़ाने वाली प्रोफेसर प्रियंका त्रिपाठी का यह शोधपूर्ण ज्ञान आप तक भी पहुंच ही चुका होगा।
आगे वे कहती हैं कि “हिंदू लड़कियों को समलैंगिकता (lesbianism) की ओर बढ़ जाना चाहिए, यही स्वाभाविक है। लेसबियन इकोफेमिनिज्म का पुनर्निर्माण होना चाहिए ताकि हिंदू लड़कियों को बचाया जा सके।”
प्रोफेसर दिव्या द्विवेदी
प्रियंका त्रिपाठी इकलौती नहीं है। ऐसे ही दिव्या द्विवेदी हैं। यह भी आईआईटी दिल्ली में दर्शनशास्त्र (philosophy) पढ़ाती हैं। कुछ समय पहले चर्चा में आई थी! तब इन्होंने कहा था कि “हिंदू कोई धर्म है ही नहीं। यह तो केवल 100-150 साल पहले पैदा हुआ है! ताकि भारत में मूल निवासियों को दबाया जा सके।”
2023 में दिल्ली में जब G-20 की बैठक चल रही थी तो यह वहां पहुंचकर विदेशी मीडिया को इंटरव्यू दे रही थी। जिसमें कह रही थी कि “मानवता को बचाने के लिए हिंदू धर्म का सफाया बहुत जरूरी है।” ये कहती है कि “भारत की 90% आबादी का क्या, जो 3000 सालों से वंश के आधार पर नस्ली ज़ुल्म, अलग-थलग किया जाना और हिंदू धर्म के रूप में झूठी और झूठी बातें भी झेल रही है। और यही वह भारत है जिसे हम अब अपनाते हुए देख रहे हैं।”
इनका एक और सिद्धांत है कि “भारत के दलित और गाजा के भाईजान एक हैं। भारत में दलितों का वही हाल रहा है, जो गाजा के समुदाय विशेष के लोगों का है।”
दीदी दो वेदों की ज्ञाता हैं। इसलिए द्विवेदी कहलाती हैं। उनके पिता राकेश द्विवेदी सुप्रीम कोर्ट के सीनियर एडवोकेट हैं और सरकार के कई मुकदमे लड़ते हैं। इनके दादा सुप्रीम कोर्ट के जज थे और नाना देवरिया से सांसद रहे हैं। और अब उनकी वामपंथी बेटी सनातन धर्म और ब्राह्मणवाद का नाश करने निकली है।
प्रोफेसर श्रुति पांडे
हरियाणा से बीजेपी सांसद नवीन जिंदल सोनीपत में ‘जिंदल ग्लोबल लॉ स्कूल’ नाम की दुकान चलाते हैं। वहां की प्रोफेसर श्रुति पांडे ऑनलाइन क्लास में पढ़ाती हैं कि ‘हिंदू धर्म और छुआछूत एक दूसरे के पर्याय हैं। बिना छुआछूत किए कोई व्यक्ति हिंदू हो ही नहीं सकता।” उनका यह भी मानना है कि “इस्लाम हिंदू से अधिक प्रगतिशील और खुला धर्म है।”
अदिति मिश्रा
जेएनयू छात्र संघ की अध्यक्ष अदिति मिश्रा भी डफली बजाती हैं। सियार की तरह आसमान में मुंह उठा के तरन्नुम में गाती हैं कि “ब्राह्मण तेरी कब्र खोदेगी।” “भारत छोड़ो- भारत छोड़ो!” वैसे तो ब्राह्मण कब्र में नहीं जाते पर दीदी चाहती हैं कि वे कब्र में ही जाएं, तो जाना ही पड़ेगा। यही लक्षण रहे तो वे कम से कम अपनी आने वाली पीढ़ियों के कब्र में जाने का इंतजाम तो कर ही देंगी।
इन मोहतरमाओं में दो बातें कॉमन है। सभी ब्राह्मण हैं और घोषित वामपंथी हैं। एक ऐसी विचारधारा जो भारत में हिंदुओं और विशेष रूप से ब्राह्मणों से घृणा पर आधारित है। यह सब मिलकर हिंदू घृणा की जो खरपतवार पैदा कर रही हैं। उसी के पैदावारों ने दिल्ली में एक पत्रकार रुचि तिवारी को पीटा और नोचा। क्योंकि वे यूजीसी नियमों के बारे में ऐसे प्रश्न पूछ रही थी, जो वामपंथी एजेंडे में फिट नहीं होता। यह प्रश्न तो उस भेदभाव के बारे में था जिसके आरोप केंद्र सरकार पर लग रहे हैं। ठीक से पता किया जाए तो हमलावरों में भी कई पांडे, तिवारी, मिश्रा और शुक्ला निकलेंगी।
वामपंथ पर ब्राह्मणों का एकाधिकार
भारत में वामपंथ पर अधिकांश ब्राह्मणों का ही आधिपत्य है। एमएन रॉय से लेकर के ईएमएस नंबूदरीपाद तक, राहुल सांकृत्यायन से लेकर गंगाधर अधिकारी और आचार्य नरेंद्र देव तक, ज्योति वसु से बुद्धदेव भट्टाचार्य और सीताराम येचुरी तक, बंगाल के पूरे वामपंथ पर ब्राह्मणों और कायस्थों का आधिपत्य है। उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम तक यह सारे वामपंथी कथित साम्यवादी कौन है? यह मंडली बहुत बड़ी है। इस मंडली में दलितों, पिछड़ों का प्रवेश वर्जित है। लेकिन वे आवाज भी उन्हीं के नाम पर उठाते हैं।
वे हिंदुओं को जातियों में बांटने के षड्यंत्र रचते हैं और हम बड़ी आसानी से उनके बिछाए जाल में फंस जाते हैं। उनकी गढ़ी जातीय अत्याचार की फर्जी कथाओं के आधार पर हर जाति स्वयं को शोषित और दूसरे को शोषक माने बैठी है। वे एक जातीय गृह युद्ध चाहते हैं और हम बिना कुछ सोचे समझे कुछ विकृत मस्तिष्क वालों के षड्यंत्र की कठपुतलियां बनते जा रहे हैं। यह षड्यंत्र इतना गंभीर और घातक है कि इसे रोकने का उत्तरदायित्व जिन लोगों पर है, वे वामपंथी झुकाव वाले अखबार इंडियन एक्सप्रेस की वामपंथी पत्रकार वंदिता मिश्रा को इंटरव्यू देने में व्यस्त हैं। उन्हें पता ही नहीं चला कि उनके मानसिक छिछलेपन और सत्ता के अहंकार ने पूरे हिंदू समाज को एक दूसरे के सामने खड़ा कर दिया।
आईआईटी में देश के श्रेष्ठ इंजीनियर तैयार होते हैं। यह समझ से परे है कि वहां पर दिव्या द्विवेदी और प्रियंका त्रिपाठी जैसी वामपंथने क्या कर रही हैं? उन्हें वहां पर किसने और क्यों भर्ती किया? उनकी सिफारिश भी तो किसी मंत्री या बड़े नेता ने की होगी। सरकार के अंदर वे कौन लोग हैं जो हिंदू विरोधी वामपंथियों को आगे बढ़ाने में जुटे हुए हैं?
किंतु यह सारे प्रश्न पूछने से पहले हमें याद रखना होगा कि 2014 से पहले तक यह स्थिति और भी गंभीर हुआ करती थी। कुछ सुधार अवश्य हुआ है। लेकिन समस्या के अनुपात में प्रक्रिया सुस्त है। हम अपना रोष व्यक्त करें लेकिन साथ-साथ यह भी सोच लें कि किस सरकार में आप अपनी बात मनवा सकते हैं और किस सरकार में आपके पास तो वह विकल्प भी नहीं होगा।
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